हिन्दी आलोचना का विकासः परम्परा से आधुनिकता तक. एक ऐतिहासिक अध्ययन

Authors

  • प्रियंका दहिया

Keywords:

हिन्दी आलोचना, परम्परा, आधुनिकता, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग, समकालीन आलोचना, साहित्यिक इतिहास।

Abstract

हिन्दी आलोचना का इतिहास भारतीय साहित्यिक परम्परा, सांस्कृतिक चेतना तथा बौद्धिक विकास की एक महत्त्वपूर्ण धारा का प्रतिनिधित्व करता है। प्रारम्भिक काल में संस्कृत काव्यशास्त्र के सिद्धान्तों का प्रभाव हिन्दी साहित्य की आलोचनात्मक दृष्टि पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। आधुनिक युग में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने साहित्य को समाज और राष्ट्र से जोड़ते हुए आलोचना की नई दिशा प्रदान की। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने भाषा, शैली, नैतिकता और उपयोगितावाद को आलोचना का आधार बनाया, जबकि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी आलोचना को वैज्ञानिक, ऐतिहासिक और वस्तुनिष्ठ स्वरूप प्रदान किया। शुक्लोत्तर काल में नन्ददुलारे वाजपेयी, हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, नामवर सिंह तथा अन्य आलोचकों ने माक्र्सवादी, मनोविश्लेषणात्मक, संरचनावादी, उत्तर-आधुनिक तथा विभिन्न विमर्श-आधारित आलोचना पद्धतियों को विकसित किया। समकालीन हिन्दी आलोचना में स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, आदिवासी-विमर्श, उत्तर-औपनिवेशिक चिंतन और डिजिटल साहित्य जैसे नए आयाम प्रमुखता से उभरे हैं। यह शोध-पत्र हिन्दी आलोचना की विकास-यात्रा का ऐतिहासिक अध्ययन प्रस्तुत करता है तथा यह स्पष्ट करता है कि परम्परा और आधुनिकता के बीच निरन्तर संवाद ने हिन्दी आलोचना को अधिक व्यापक, बहुआयामी और समाजोन्मुख बनाया है। यह अध्ययन हिन्दी आलोचना की प्रमुख प्रवृत्तियों, उपलब्धियों तथा समकालीन प्रासंगिकता का सम्यक् विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

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Published

2026-07-10

How to Cite

प्रियंका दहिया. (2026). हिन्दी आलोचना का विकासः परम्परा से आधुनिकता तक. एक ऐतिहासिक अध्ययन. Eduzone: International Peer Reviewed/Refereed Multidisciplinary Journal, 15(2), 43–47. Retrieved from https://www.eduzonejournal.com/index.php/eiprmj/article/view/960